
प्रतिनिधी :सुरेश बोर्ले
यह तस्वीर नहीं, करुणा का उद्घोष है। यह दृश्य नहीं, भारत की आत्मा का उद्धार है।
जब राष्ट्र के सच्चे रक्षक गुमनाम रहते हैं, तो राष्ट्र की आत्मा रोती है। और जब देर-सवेर उन्हें गले लगाकर कहा जाता है – भारत को आप पर गर्व है।
यह तस्वीर एक नए भारत का घोषणापत्र है – जहाँ सत्ता के सिंहासन से कोई घोषणा नहीं होती, बल्कि झुर्रियों वाले हाथों को चूमकर इतिहास रचा जाता है।
गुड़ियों में रामायण और महाभारत को जीवित रखने वाले 96 वर्षीय तपस्वी भीमावा दोड्डाबलप्पा शिलेक्याथारा मीडिया की सुर्खियों या बौद्धिक गलियारों में नहीं थे। लेकिन अब भारत में उन्हें वह सम्मान मिला है जिसने दशकों से अधूरी आत्मा को पूरा किया है – पद्मश्री।
गुड़ियों की उंगलियों से संस्कृति की नब्ज थामने वाली महिला आज इस देश की आत्मा की नायिका है।
झुकी हुई पीठ को सहारा देना और उसे राष्ट्रपति भवन तक लाना न केवल सम्मान की बात है, बल्कि भारत माता के घावों पर मरहम लगाने जैसा है
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