एसएमएस :संपादकीय
“यह सिर्फ हार नहीं, भारतीय टेस्ट क्रिकेट के चरित्र की परीक्षा है”
भारत की क्रिकेट संस्कृति में टेस्ट मैच सिर्फ खेल नहीं — सम्मान, धैर्य और समझदारी की परीक्षा माने जाते हैं। लेकिन साउथ अफ्रीका के खिलाफ मिली 408 रनों की करारी हार ने ये साबित कर दिया कि भारतीय टेस्ट टीम आज सबसे बड़े संकट से गुजर रही है — यह संकट प्रतिभा या क्षमता का नहीं, बल्कि दिशा और मानसिकता का है।
अब सवाल सिर्फ हार का नहीं— पहचान का है
भारत वह टीम रही है जिसने ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड में इतिहास रचा। लेकिन वही टीम अपने ही घर में सीरीज हारकर क्लीन स्वीप होती दिखी। यह सिर्फ एक सीरीज नहीं हारी, बल्कि दशकों की स्थापित प्रतिष्ठा पर चोट हुई है।
यह हार बताती है कि भारतीय टेस्ट क्रिकेट में वह पुरानी जिद, वह “हम नहीं झुकेंगे” वाला रवैया अब कमजोर पड़ रहा है।
बल्लेबाज़ी की असल समस्या — जल्दी खेलने की बीमारी
हमने देखा कि भारतीय बल्लेबाज़ स्पिन, स्विंग या बाउंस— किसी भी चुनौती के लिए तैयार नहीं थे।
जो क्रिकेट धीरे और समझदारी से खेलने की मांग करता है, वहां बल्लेबाज़ IPL जैसी गति से खेलने लगे।
टेस्ट क्रिकेट धैर्य की लड़ाई है, ट्विटर की स्क्रॉलिंग नहीं।
टीम चयन — प्रश्न ज़्यादा, जवाब कम
भारत की हार में चयन समिति की भूमिका भी कम नहीं।
लगातार बदलाव, बिना स्पष्ट योजना, पुराने खिलाड़ियों पर जरूरत से ज़्यादा निर्भरता और फॉर्म में चल रहे खिलाड़ियों को मौका न देना — इन सबने टीम का संतुलन बिगाड़ दिया।
ऐसा लगा जैसे टीम मैदान में खेलने उतरी नहीं, बल्कि एक प्रयोगशाला में टेस्ट केस बनकर आई हो।
मानसिक मजबूती — जो सबसे पहले टूटी
हारना खेल का हिस्सा है, लेकिन बिना लड़े हार मान लेना खेल का अपमान है।
पहला झटका लगते ही खिलाड़ियों के चेहरे पर निराशा और रणनीति की उलझन साफ दिखी।
जीत अपने आप नहीं मिलती — उसे दांतों से पकड़कर छीनना पड़ता है।
भारत वह जज्बा नहीं दिखा सका।
यह समय बदलाव का है — बहानों का नहीं
अब यह समय बहाने बनाने का नहीं, बल्कि फैसले लेने का है।
भारतीय क्रिकेट को टेस्ट क्रिकेट के लिए अलग रोडमैप चाहिए —
✔ चयन में निरंतरता
✔ तकनीकी और मानसिक मजबूती पर काम
✔ लाल गेंद क्रिकेट को प्राथमिकता
✔ गैर–ज़रूरी दबाव और आराम क्षेत्र से बाहर निकलना
अगर यह नहीं हुआ, तो हार का यह अध्याय अंतिम नहीं — शुरुआत होगा।
निष्कर्ष: इतिहास गवाह है — बड़ी टीमें तब नहीं बनतीं जब वे जीतती हैं,
बल्कि तब बनती हैं जब वे हार से सीखकर उठती हैं।
अब यह भारतीय टीम पर है—
क्या यह हार रिकॉर्ड बुक में एक शर्मनाक पंक्ति बनेगी?
यायही हार नई शुरुआत की चिंगारी बनेगी?
भारत की क्रिकेट को आज एक सवाल पूछना चाहिए —
“क्या हमने लड़ना छोड़ दिया है — या लड़ाई अभी शुरू हुई है?”
Right
Jeet ki suruwat hai