क्या भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के शीर्षनेतृत्व में परिवर्तन होना चाहिए ??

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निसार अली

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस (INC)आज भारत की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी पिछले 7 सालों से लगातार अपना जनाधार खो रही है। आखिर इसके क्या कारण हैं ?
स्वतंत्रता दिलाने मे भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का महत्वपूर्ण योगदान और स्वतंत्रता के बाद आजाद भारत को पहला प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के रूप मे देने वाली काँग्रेस पार्टी आखिर क्यों अपना जनाधार खो रही है। इस के कई कारण है। एक काँग्रेस का इन्फ्रास्ट्रक्चर दिन ब दिन कमजोर होता जा रहा है। आज के परिपेक्ष मे देखा जाये तो लोकसभा मे 50 के आसपास सिमटी काँग्रेस और केवल 2 बडे राज्य राजस्थान और छत्तीसगड मे काँग्रेस अपने बल पर सत्ता में है । महाराष्ट्र,झारखंड मे सहयोगियों के साथ मिलकर सत्ता सुख भोग रही है। काँग्रेस अपनी असफलता के लिये खुद जिम्मेदार है। हालांकी सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी ने शुरूवात बडे अच्छे तरीके से की थी परंतु वह टेम्पो कायम नही रख पाये । काँग्रेस कार्यकर्ताओं को एकजूट रखने मे और उनमें संघर्ष और सत्ता प्राप्ती के लिये जन सामान्य से जुडने की कवायद मे कमी होने की वजह से भाजपा के विरोध मे सक्षम विरोधी दल भी नही बन पाने की वजह यह है की इतिहास मे देखा जाये तो जब जब काँग्रेस की पराजय हुई तब तब काँग्रेस विरोधी सरकारे आपस मे एकजूट नही रह पाने की वजह से आसानी से काँग्रेस को फिर सत्ता मिलने से काँग्रेस नेतृत्व और कार्यकर्ताओ मे यह भ्रम फैल गया की विरोधीयो की सत्ता जायेगी और राष्ट्रीय राजनैतिक विकल्प के रूप मे सत्ता की चाबी काँग्रेस के हाथ लगेगी इस उम्मीद और आशा पर पिछले 8 वर्षो से काँग्रेस के नेता है की एक दिन जनता भाजपा से दुरी बनायेगी और सत्ता काँग्रेस को सौंपेगी। भाजपा का नेतृत्व नरेंद्र मोदी जरूर कर रहे है। मात्र भाजपा का संगठन और सहयोगी संगठन लगतार 24×7 काम कर रहे है। जिसकी वजह से अँटी इन्कमबन्सी होते हुए भी केवल प्रधान मंत्री के नाम पर नही अपितु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,और संघ से जुडे सैकड़ों संगठन हिंदुत्व की पॉलिसी आम जनता तक पहूंचाने का काम करते है और इस काम मे वह बडी मात्रा मे सफल होने की वजह से भाजपा अपना जनाधार भारी विरोध के बावाजूद बढ़ाने मे सफल हुई है। वही काँग्रेस मे कोई बडा जनाधार वाला नेता गांधी परिवार के अलावा नहीं दिखाई देता। प्रियंका गांधी,राहुल गांधी की सभा मे भीड तो होती है मात्र इस भीड को वोट मे तब्दील करने के लिये जो इन्फ्रास्ट्रक्चर या संगठन चाहिये वह आज काँग्रेस के पास नही रहा। दूसरा बडा कारण काँग्रेसी कार्यकर्ता निराश और हतोत्साहीत हुए है। उनकी निराशा दूर करना और संगठनात्मक कमजोरियों को दूर कर फिर नये रूप से संगठनात्मक एकजुटता इस समय बहुत जरुरी है जो होते हुये नही दिखाई पडती। हाँ कभी कभार एकाध नेता इस संदर्भ मे कुछ बोलते जरूर है। वही शीर्ष नेतृत्व को इस की जानकारी भी है या पता नही क्योंकि नेताओ की सभाओं मे भीड कैसे जमाई जाती है यह खुली किताब की तरह है।आज कुछ राज्यो मे जो इन्फ्रास्ट्रक्चर बचा है वह कुछ ही लॉयल नेताओ की बदौलत। वही कई ऐसे नेताओ की भी भरमार है जो काँग्रेस के चुनाव चिन्ह हाथ का पंजा पर चुनाव जीतते है परंतु यदी उनकी जगह किसीं और को वह सीट दे दी जाये तो ऊस व्यक्ती का चुनाव जितना भी मूमकिन नही। यह वस्तुस्थिती है। काँग्रेस पार्टी मे आज बडे बडे नेता और कार्यकर्ता है जो पार्टी के लिये अपना सर्वस्व लगाने के लिये उत्सुक है ऐसे कार्यकर्ता और नेताओ को चुनचुनकर संगठन मजबूत किया जा सकता है। पर क्या सेल्फ सेन्ट्रीक नेता और चाटुकार कार्यकर्ता यह बात पार्टी के शीर्ष नेता तक पहूंचने देंगे। देश मे लोकतंत्र की मांग करने वाली देश की सबसे पुरानी पार्टी क्या संगठन मे लोकतंत्र को मजबूत कर संगठन की खामिया दूर करेगी। आने वाला समय यह तय करेगा। संगठन मे जोश,नई स्फूर्ती लाने का समय अब आ गया है। अब देखना यही है की गाँधी परिवार के इर्द गिर्द नेतृत्व की कमान वाली पार्टी क्या गांधी परिवार के अलावा किसीं दुसरे चेहरे को स्वीकार कर पायेगी?और काँग्रेस मे बूथ से लेकर काँग्रेस वर्किंग पार्टी तक कार्यकर्ता और नेता अलग अलग गुटो मे बंटे है। उनको एकजूट कर पाना भी एक बहुत बड़ी चुनौती है।


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