जनगणना 2027: समावेश पर संवाद आज मुंबई प्रेस क्लब में…

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एसएमएस -प्रतिनिधी -उत्कर्ष बोर्ले

मुंबई, 24 फरवरी — शिक्षाविदों, विशेषज्ञों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों का एक समूह आज मुंबई प्रेस क्लब में जनगणना 2027 पर विचार-विमर्श के लिए एकत्रित होगा। यह परामर्श ऐसे समय में हो रहा है जब जनगणना के निष्कर्ष आने वाले वर्षों में प्रतिनिधित्व, कल्याणकारी नीतियों और संसाधनों के वितरण को प्रभावित करेंगे।
इस संवाद का नेतृत्व पीपुल्स सेंसस वॉच करेगा—एक अनौपचारिक मंच, जो यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि जनगणना 2027 हाशिये पर रहने वाले समुदायों की वास्तविकताओं को सटीक रूप से दर्ज करे।
मंच द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि 2021 की जनगणना, जो छह वर्ष से विलंबित है, अब 2027 में प्रस्तावित है। यह 1931 के बाद पहली बार जाति गणना को शामिल करेगी और देश की पहली पूर्णतः डिजिटल जनगणना होगी। इसके निष्कर्ष परिसीमन और संसद में महिला आरक्षण के क्रियान्वयन को आकार देंगे। इसलिए, प्रक्रिया की पारदर्शिता और समावेश सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि कोई भी समुदाय गिनती से बाहर न रह जाए।
दो चरणों में होगी जनगणना
जनगणना दो चरणों में आयोजित की जाएगी:
चरण 1: मकान सूचीकरण एवं आवास जनगणना — अप्रैल 2026 से प्रारंभ।
चरण 2: जनसंख्या गणना — मार्च 2027 तक।
जनसंख्या गणना की संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 की रात 00:00 बजे होगी। जबकि लद्दाख, जम्मू-कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के गैर-समकालिक हिमाच्छादित क्षेत्रों के लिए संदर्भ तिथि 1 अक्टूबर 2026 की रात 00:00 बजे निर्धारित की गई है।
विशेषज्ञों की भागीदारी
प्रख्यात विद्वान और सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफेसर जी.एन. देवी उद्घाटन वक्तव्य देंगे, जिसमें वे जनगणना की संस्थागत महत्ता और इससे जुड़े व्यापक दांव पर प्रकाश डालेंगे।
परामर्श में विमुक्त और घुमंतू जनजातियों (DNTs) सहित हाशिये पर रहने वाले समुदायों के समक्ष आने वाली चुनौतियों पर चर्चा होगी। DNT समुदाय की नेत्री ललिता धानवटे और लेखक डॉ. राम पुनियानी अपने विचार साझा करेंगे।
प्रख्यात अर्थशास्त्री और नारीवादी विद्वान प्रोफेसर रितु देवान जनगणना के संभावित लैंगिक प्रभावों पर अपनी अंतर्दृष्टि रखेंगी। चर्चा की अध्यक्षता वरिष्ठ अधिवक्ता गायत्री सिंह करेंगी।
डिजिटल प्रारूप पर उठे सवाल
पर्यवेक्षकों ने प्रस्तावित “पूरी तरह डिजिटल” प्रारूप को लेकर पहुंच, सटीकता और डेटा सुरक्षा पर अधिक स्पष्टता की मांग की है। 15 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों में कंप्यूटर साक्षरता लगभग 24.7% होने के कारण आशंका जताई जा रही है कि डिजिटल-प्रथम दृष्टिकोण सबसे कमजोर तबकों को बाहर कर सकता है।
2018 में ऑस्ट्रेलिया की पहली डिजिटल जनगणना के दौरान अत्यधिक मांग के चलते तकनीकी व्यवधान उत्पन्न हुए थे—जो भारत जैसे विशाल और विविध देश में आवश्यक बुनियादी ढांचे और आकस्मिक योजना की व्यापकता को रेखांकित करता है।
विशेषज्ञों का मत है कि इतने बड़े पैमाने पर डेटा अद्यतन अभ्यास के लिए सावधानीपूर्वक डिज़ाइन और मजबूत सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं, ताकि कमजोर वर्ग पीछे न छूटें और जनगणना वास्तव में “समावेशी” बन सके।


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