‘जिलाधिकारी या पोस्टमैन?’

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एसएमएस-विशेष प्रतिनिधी.

मनोरी डिसेलिनेशन परियोजना के खिलाफ मछुआरों का आक्रोश!

3,000 करोड़ की परियोजना पर रोक लगाने की मांग; निर्णय लेने वाले BMC अधिकारी बैठक से नदारद, प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल

मुंबई : मनोरी में प्रस्तावित डिसेलिनेशन परियोजना को लेकर मछुआरा समुदाय का आक्रोश बढ़ता जा रहा है। करीब 3,000 करोड़ रुपये की इस परियोजना पर रोक लगाने की मांग के बावजूद जिला प्रशासन की ओर से ठोस निर्णय नहीं लिए जाने पर मछुआरा प्रतिनिधियों ने नाराजगी जताई। ‘जनता की समस्याओं का समाधान करने के लिए जिलाधिकारी हैं या केवल मांगों को सरकार तक पहुंचाने वाले पोस्टमैन?’ ऐसा तीखा सवाल उठाते हुए प्रतिनिधियों ने प्रशासन की भूमिका पर निशाना साधा। वहीं, मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के निर्णय लेने में सक्षम वरिष्ठ अधिकारियों के बैठक में अनुपस्थित रहने से भी मछुआरों में नाराजगी बढ़ गई।

सोमवार (19 अक्टूबर) को मनोरी डिसेलिनेशन परियोजना के विरोध में मछुआरों ने जनआक्रोश मोर्चा निकाला। इसके बाद माजी विधायक भाई जगताप के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी सौरभ कटियार से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री के साथ प्रस्तावित अगली बैठक तक परियोजना के निर्माण कार्य पर रोक लगाने की मांग की। हालांकि, जिलाधिकारी ने निर्माण कार्य रोकने में असमर्थता जताते हुए मांगों को सरकार तक पहुंचाने का आश्वासन दिया। इससे नाराज मछुआरा प्रतिनिधियों ने सवाल उठाया कि मछुआरों की आजीविका से जुड़े गंभीर मुद्दे पर प्रशासन जिम्मेदारी लेगा या केवल आश्वासन देकर अपनी भूमिका पूरी करेगा?

एनओसी नहीं, फिर भी निर्माण कार्य कैसे?

प्रतिनिधियों के अनुसार, बैठक में यह बात सामने आई कि मत्स्य व्यवसाय विभाग ने इस परियोजना के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) जारी नहीं किया है। ऐसे में मछुआरों के पारंपरिक व्यवसाय पर प्रतिकूल प्रभाव डालने की आशंका वाली परियोजना का निर्माण कार्य जारी कैसे रह सकता है, यह सवाल उठाया गया।

अखिल महाराष्ट्र मच्छीमार कृति समिति के अध्यक्ष देवेंद्र दामोदर तांडेल ने मांग की कि मछुआरों की सभी आपत्तियों और शंकाओं का समाधान होने तक निर्माण कार्य पर रोक लगाई जाए। उन्होंने कहा कि केवल मुख्यमंत्री के साथ बैठक कराने का आश्वासन पर्याप्त नहीं है। प्रशासन को इस मामले में ठोस निर्णय लेना चाहिए।

निर्णय लेने वाले BMC अधिकारी बैठक से नदारद!

मछुआरों के भविष्य से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर बीएमसी के वरिष्ठ और निर्णय लेने में सक्षम अधिकारियों के बैठक में उपस्थित नहीं रहने का आरोप प्रतिनिधियों ने लगाया। उनके स्थान पर कनिष्ठ स्तर के अधिकारियों को भेजे जाने पर नाराजगी जताते हुए सवाल किया गया कि क्या महानगरपालिका को मछुआरा समुदाय की समस्याओं की गंभीरता का एहसास है?

प्रतिनिधियों ने कहा कि केवल बैठकों और आश्वासनों से समस्या का समाधान नहीं होगा। प्रशासन को अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए ठोस कदम उठाने चाहिए।

845 एमएलडी पानी बचाने की संभावना का मुद्दा

नेशनल फिशवर्कर्स फोरम (NFF) के अध्यक्ष रामकृष्ण तांडेल ने मुंबई में पानी की बर्बादी और वितरण व्यवस्था में होने वाले नुकसान का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि पानी की लीकेज रोकने और वितरण व्यवस्था में सुधार करने से बड़े पैमाने पर पानी बचाया जा सकता है।

उनके अनुसार, लगभग 845 एमएलडी पानी की संभावित बचत हो सकती है। दूसरी ओर, 3,000 करोड़ रुपये से अधिक की लागत और सालाना लगभग 147 करोड़ रुपये के अनुमानित बिजली खर्च वाली परियोजना की व्यवहार्यता पर उन्होंने सवाल उठाए।

अखिल महाराष्ट्र मच्छीमार कृति समिति के कार्याध्यक्ष बर्नार्ड डिमेलो ने कहा कि अनियंत्रित निर्माण और बढ़ती आबादी के कारण मुंबई में प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने मांग की कि पानी की समस्या का समाधान तलाशते समय शहर के अनियंत्रित विस्तार और उपलब्ध संसाधनों की सीमाओं पर भी गंभीरता से विचार किया जाए।

समुद्री जैव विविधता और मछुआरों की आजीविका पर संकट?

मछुआरा नेता किरण कोली ने आशंका जताई कि डिसेलिनेशन प्रक्रिया से निकलने वाला अत्यधिक खारापन युक्त पानी समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और मछली पकड़ने के व्यवसाय को नुकसान पहुंचा सकता है। उन्होंने कहा कि पीढ़ियों से समुद्र पर निर्भर मछुआरों की आजीविका को ध्यान में रखे बिना ऐसी परियोजना आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा।

गोराई विलेज वेलफेयर एसोसिएशन की अध्यक्ष स्विटी हेन्रिक्स ने परियोजना क्षेत्र में प्रागैतिहासिक काल के औजार मिलने का मुद्दा उठाया। उन्होंने इस क्षेत्र के पुरातात्विक महत्व को देखते हुए आवश्यक जांच और संरक्षण संबंधी उपायों की पड़ताल करने की मांग की।

बैठक के दौरान वर्सोवा में भी एक अन्य डिसेलिनेशन परियोजना की योजना होने की जानकारी सामने आने का दावा प्रतिनिधियों ने किया। इससे मुंबई की विभिन्न तटीय बस्तियों में रहने वाले पारंपरिक मछुआरों के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ गई है।

15 से अधिक बसें रोके जाने का आरोप

मोर्चे में शामिल होने के लिए निकलीं मछुआरों की 15 से अधिक बसों को पुलिस द्वारा रोके जाने, चालकों को हिरासत में लेने और बसों की चाबियां जब्त करने का आरोप आंदोलनकारियों ने लगाया। उन्होंने कहा कि अपनी पारंपरिक आजीविका की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने वाले मछुआरों को रोकना अन्यायपूर्ण है।

आंदोलनकारियों ने इस कार्रवाई का कानूनी आधार स्पष्ट करने तथा बसों और चालकों को तत्काल मुक्त करने की मांग की।

‘परियोजना रद्द होने तक संघर्ष जारी रहेगा’

वरिष्ठ मछुआरा नेता और महाराष्ट्र मच्छीमार कृति समिति के अध्यक्ष लियो कोलासो ने परियोजना के खिलाफ संघर्ष जारी रखने का संकल्प व्यक्त किया। विधायक भाई जगताप ने भी प्रतिनिधिमंडल की मांगों का समर्थन करते हुए कहा कि सभी संबंधित पक्षों की आपत्तियों का समाधान होने तक निर्माण कार्य पर रोक लगाई जानी चाहिए।

प्रतिनिधिमंडल में रामकृष्ण तांडेल, लियो कोलासो, देवेंद्र दामोदर तांडेल, बर्नार्ड डिमेलो, किरण कोली, चिंतामण निवाते, गीता भंडारी, फ्रिडा बर्नार्ड डिमेलो, शर्मिला अजित गांडोळी, शॉन लियो कोलासो, तारेन मेंडोन्सा और स्विटी हेन्रिक्स सहित गोराई, मनोरी, मढ़, उत्तन, पाली, डोंगरी और चौक की विभिन्न मछुआरा सहकारी संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल थे।

अखिल महाराष्ट्र मच्छीमार कृति समिति के अध्यक्ष देवेंद्र दामोदर तांडेल ने स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री के साथ बैठक कराने का आश्वासन देना पर्याप्त नहीं है। मछुआरों की आजीविका, समुद्री पर्यावरण और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित होने तक विरोध जारी रहेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि मनोरी डिसेलिनेशन परियोजना रद्द होने तक मछुआरा समुदाय का संघर्ष जारी रहेगा।


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